बंदउँ संत समान चित हित अनहित
बंदउँ संत समान चित हित अनहित
दोहा ३ (क) · बालकाण्ड
दोहा पाठ
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ। अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ॥ ३ (क) ॥
अर्थ
मैं संतों को प्रणाम करता हूँ, जिनके चित्त में समता है, जिनका न कोई मित्र है और न शत्रु। जैसे अंजलि में रखे हुए सुन्दर फूल (जिस हाथ ने फूलों को तोड़ा और जिस हाथ ने उनको रखा, उन) दोनों ही हाथों को समान रूप से सुगन्धित करते हैं, वैसे ही संत शत्रु और मित्र दोनों का ही समान रूप से कल्याण करते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “ब्राह्मण संत वन्दना” प्रकरण का दोहा ३ (क) है। इस प्रकरण में ब्राह्मणों और संतों की महिमा, समभाव और लोककल्याणकारी कृपा का स्तुतिपूर्ण नमन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
ब्राह्मण संत वन्दना