बालमीक नारद घटजोनी
बालमीक नारद घटजोनी
चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बालमीक नारद घटजोनी। निज निज मुखनि कही निज होनी॥ जलचर थलचर नभचर नाना। जे जड़ चेतन जीव जहाना॥ २ ॥
अर्थ
वाल्मीकिजी, नारदजी और घटजोनी ने अपने-अपने मुखों से अपनी होनी (जीवन का वृत्तान्त) कही है। जलचर, थलचर, नभचर नाना प्रकार के जड़-चेतन जितने जीव इस जगत् में हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “ब्राह्मण संत वन्दना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ब्राह्मणों और संतों की महिमा, समभाव और लोककल्याणकारी कृपा का स्तुतिपूर्ण नमन का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
ब्राह्मण संत वन्दना