बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी

चौपाई ६, दोहा ३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी। कहत साधु महिमा सकुचानी॥ सो मो सन कहि जात न कैसें। साक बनिक मनि गुन गन जैसें॥ ६ ॥

अर्थ

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कवि और पण्डितों की वाणी भी संत-महिमा का वर्णन करने में सकुचाती है; वह मुझसे किस प्रकार नहीं कही जाती, जैसे साग बेचने वाले से मणियों के गुण-समूह नहीं कहे जा सकते।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “ब्राह्मण संत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ब्राह्मणों और संतों की महिमा, समभाव और लोककल्याणकारी कृपा का स्तुतिपूर्ण नमन का वर्णन है।

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ब्राह्मण संत वन्दना