सठ सुधरहिं सतसंगति पाई

चौपाई ५, दोहा ३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई। पारस परस कुधात सुहाई॥ बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं। फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं॥ ५ ॥

अर्थ

दुष्ट भी सत्संगति पाकर सुधर जाते हैं, जैसे पारस के स्पर्श से लोहा सुहावना हो जाता है (सुन्दर सोना बन जाता है)। किन्तु दैवयोग से यदि कभी सज्जन कुसंगति में पड़ जाते हैं, तो वे वहाँ भी साँप की मणि के समान अपने गुणों का ही अनुसरण करते हैं (अर्थात् जिस प्रकार साँप का संसर्ग पाकर भी मणि उसके विष को ग्रहण नहीं करती तथा अपने सहज गुण-प्रकाश को नहीं छोड़ती, उसी प्रकार साधु पुरुष दुष्टों के संग में रहकर भी दूसरों को प्रकाश ही देते हैं, दुष्टों का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता)।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “ब्राह्मण संत वन्दना” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में ब्राह्मणों और संतों की महिमा, समभाव और लोककल्याणकारी कृपा का स्तुतिपूर्ण नमन का वर्णन है।

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ब्राह्मण संत वन्दना