दुरबासा मोहि दीन्ही सापा

चौपाई ४, दोहा ३३ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा॥ सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही॥ ४ ॥

अर्थ

[वह बोला--] दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा-- ] हे गन्धर्व! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करनेवाला मुझे नहीं सुहाता।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “कबंध उद्धार” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ३३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कबंध के शापमुक्त होकर दिव्य गंधर्व स्वरूप प्राप्त करने का वर्णन है।

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कबंध उद्धार