कहि निज धर्म ताहि समुझावा

चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड

चौपाई पाठ

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा॥ रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई॥ २ ॥

अर्थ

श्रीरामजी ने अपना धर्म (भागवत-धर्म) कहकर उसे समझाया। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति (गन्धर्व का स्वरूप) पाकर आकाश में चला गया।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “कबंध उद्धार” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ३४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में कबंध के शापमुक्त होकर दिव्य गंधर्व स्वरूप प्राप्त करने का वर्णन है।

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कबंध उद्धार