भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं
दोहा ४ · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार। जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार॥ ४ ॥
अर्थ
भरतजी की दाहिनी आँख और दाहिनी भुजा बार-बार फड़क रही है। इसे शुभ शकुन जानकर उनके मन में अत्यन्त हर्ष हुआ और वे विचार करने लगे--।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का दोहा ४ है। इस प्रकरण में उत्तरकाण्ड के आरंभ में प्रभु राम, गुरु और संतों की पवित्र वंदना तथा राम के आगमन के शुभ शकुनों का वर्णन है।
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मंगलाचरण