केकीकण्ठाभनीलं सुरवर
केकीकण्ठाभनीलं सुरवर
श्लोक १ · उत्तरकाण्ड
श्लोक पाठ
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम्। पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम्॥ १ ॥
अर्थ
मोर के कण्ठ की आभा के समान नीलवर्ण, देवताओं में श्रेष्ठ, ब्राह्मण (भृगुजी) के चरणकमल के चिह्न से सुशोभित, शोभा से पूर्ण, पीताम्बरधारी, कमलनेत्र, सदा परम प्रसन्न, हाथों में बाण और धनुष धारण किये हुए, वानरसमूह से युक्त, भाई लक्ष्मणजी से सेवित, स्तुति किये जाने योग्य, श्रीजानकीजी के पति, रघुकुलश्रेष्ठ, पुष्पकविमान पर सवार श्रीरामचन्द्रजी को मैं निरन्तर नमस्कार करता हूँ।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक १ है। इस प्रकरण में उत्तरकाण्ड के आरंभ में प्रभु राम, गुरु और संतों की पवित्र वंदना तथा राम के आगमन के शुभ शकुनों का वर्णन है।
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मंगलाचरण