सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत
सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत
छन्द, दोहा ८३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
छन्द पाठ
सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही। पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही॥ ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी। तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी॥
अर्थ
वह ब्रह्मा की दी हुई प्रचण्ड शक्ति अनन्त की छाती में लगी। वीर व्याकुल होकर गिर पड़ा। तब दसमुख उसे उठाने लगा, पर उसके अतुल बल की महिमा रह गई। ब्रह्मांड-भवन में विराजने वाले जिनके एक सिर पर धूल का कण-सा लगता है, उन्हें मूर्ख रावण उठाना चाहता है। वह त्रिभुवन के धनी को नहीं जानता।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “लक्ष्मण-रावण युद्ध” प्रकरण का छन्द, दोहा ८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण और रावण के बीच भीषण युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्रों के प्रचंड प्रहार का वर्णन है।
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लक्ष्मण-रावण युद्ध