रे खल का मारसि कपि भालू
रे खल का मारसि कपि भालू
चौपाई १, दोहा ८३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
रे खल का मारसि कपि भालू। मोहि बिलोकु तोर मैं कालू॥ खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती। आजु निपाति जुड़ावउँ छाती॥ १ ॥
अर्थ
[लक्ष्मणजी ने पास जाकर कहा--] अरे दुष्ट! वानर-भालुओं को क्या मार रहा है? मुझे देख, मैं तेरा काल हूँ! [रावण ने कहा--] ओ रे मेरे पुत्र के घातक! मैं तुझको ढूँढ़ रहा था। आज तुझे मारकर [अपनी] छाती ठंडी करूँगा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “लक्ष्मण-रावण युद्ध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ८३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लक्ष्मण और रावण के बीच भीषण युद्ध तथा अस्त्र-शस्त्रों के प्रचंड प्रहार का वर्णन है।
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लक्ष्मण-रावण युद्ध