संत संभु श्रीपति अपबादा

चौपाई २, दोहा ६४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

संत संभु श्रीपति अपबादा। सुनिअ जहाँ तहँ असि मरजादा॥ काटिअ तासु जीभ जो बसाई। श्रवन मूदि न त चलिअ पराई॥ २ ॥

अर्थ

जहाँ संत, शिवजी और लक्ष्मीपति विष्णुभगवान् की निंदा सुनी जाय वहाँ ऐसी मर्यादा है कि यदि अपना वश चले तो उस (निंदा करनेवाले) की जीभ काट ले और नहीं तो कान मूँदकर वहाँ से भाग जाए।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का देहत्याग, दक्ष यज्ञ विध्वंस” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का योगाग्नि में देहत्याग और वीरभद्र द्वारा दक्ष यज्ञ के विध्वंस का वर्णन है।

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सती का देहत्याग, दक्ष यज्ञ विध्वंस