फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी

चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

फिरिहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी। देखिहउँ नयन मनोहर जोरी॥ सुदिन सुघरी तात कब होइहि। जननी जिअत बदन बिधु जोइहि॥ ४ ॥

अर्थ

हे विधाता! क्या मेरी दशा भी फिर पलटेगी? क्या अपने नेत्रों से मैं इस मनोहर जोड़ी को फिर देख पाऊँगी? हे पुत्र! वह सुन्दर दिन और शुभ घड़ी कब होगी जब तुम्हारी जननी जीते-जी तुम्हारा चाँद-सा मुखड़ा फिर देखेगी!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम, कौसल्या और सीता का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनगमन से पूर्व श्रीराम, माता कौसल्या और सीता के बीच करुण विदाई संवाद का वर्णन है।

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राम, कौसल्या और सीता का संवाद