बारहिं बार लाइ उर लीन्ही
बारहिं बार लाइ उर लीन्ही
चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
बारहिं बार लाइ उर लीन्ही। धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही॥ अचल होउ अहिवातु तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा॥ ४ ॥
अर्थ
उन्होंने सीताजी को बार-बार हृदय से लगाया और धीरज धरकर शिक्षा दी और आशीर्वाद दिया कि जब तक गंगा और यमुना में जल की धारा बहे, तब तक तुम्हारा सुहाग अचल रहे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम, कौसल्या और सीता का संवाद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनगमन से पूर्व श्रीराम, माता कौसल्या और सीता के बीच करुण विदाई संवाद का वर्णन है।
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राम, कौसल्या और सीता का संवाद