लखि सनेह कातरि महतारी

चौपाई १, दोहा ६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लखि सनेह कातरि महतारी। बचनु न आव बिकल भइ भारी॥ राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना। समउ सनेहु न जाइ बखाना॥ १ ॥

अर्थ

यह देखकर कि माता स्नेह के मारे अधीर हो गयी हैं और इतनी अधिक व्याकुल हैं कि मुँह से वचन नहीं निकलता, श्रीरामचन्द्रजी ने अनेक प्रकार से उन्हें समझाया। वह समय और स्नेह वर्णन नहीं किया जा सकता।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम, कौसल्या और सीता का संवाद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनगमन से पूर्व श्रीराम, माता कौसल्या और सीता के बीच करुण विदाई संवाद का वर्णन है।

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राम, कौसल्या और सीता का संवाद