तब जानकी सासु पग लागी

चौपाई २, दोहा ६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तब जानकी सासु पग लागी। सुनिअ माय मैं परम अभागी॥ सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा। मोर मनोरथु सफल न कीन्हा॥ २ ॥

अर्थ

तब जानकीजी सास के पाँव लगीं और बोलीं—हे माता! सुनिये, मैं बड़ी ही अभागिनी हूँ। आपकी सेवा करने के समय दैव ने मुझे वनवास दे दिया। मेरा मनोरथ सफल न किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम, कौसल्या और सीता का संवाद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वनगमन से पूर्व श्रीराम, माता कौसल्या और सीता के बीच करुण विदाई संवाद का वर्णन है।

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राम, कौसल्या और सीता का संवाद