सहि सक न भार उदार अहिपति
छन्द २, दोहा ३५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
छन्द पाठ
सहि सक न भार उदार अहिपति बार बारहिं मोहई। गह दसन पुनि पुनि कमठ पृष्ट कठोर सो किमि सोहई॥ रघुबीर रुचिर प्रयान प्रस्थिति जानि परम सुहावनी। जनु कमठ खर्पर सर्पराज सो लिखत अबिचल पावनी॥ २ ॥
अर्थ
उदार (परम श्रेष्ठ एवं महान्) सर्पराज शेषजी भी सेना का बोझ नहीं सह सकते, वे बार-बार मोहित हो जाते (घबड़ा जाते) हैं और पुनः-पुनः कच्छप की कठोर पीठ को दाँतों से पकड़ते हैं। ऐसा करते (अर्थात् बार-बार दाँतों को गड़ाकर कच्छप की पीठ पर लकीर-सी खींचते हुए) वे कैसे शोभा दे रहे हैं मानो श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दर प्रस्थानयात्रा को परम सुहावनी जानकर उसकी अचल पवित्र कथा को सर्पराज शेषजी कच्छप की पीठ पर लिख रहे हों।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “राम की सेना समुद्र तट पर” प्रकरण का छन्द २, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीरामजी का वानर सेना सहित समुद्र तट पर शुभ प्रस्थान और पहुँचने का वर्णन है।