चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल

छन्द १, दोहा ३५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

छन्द पाठ

चिक्करहिं दिग्गज डोल महि गिरि लोल सागर खरभरे। मन हरष सभ गंधर्ब सुर मुनि नाग किंनर दुख टरे॥ कटकटहिं मर्कट बिकट भट बहु कोटि कोटिन्ह धावहीं। जय राम प्रबल प्रताप कोसलनाथ गुन गन गावहीं॥ १ ॥

अर्थ

दिशाओं के हाथी चिग्घाड़ने लगे, पृथ्वी डोलने लगी, पर्वत चंचल हो गये (काँपने लगे) और समुद्र खलबला उठे। गन्धर्व, देवता, मुनि, नाग, किन्नर सबके सब मन में हर्षित हुए कि [अब] हमारे दुःख टल गये। अनेकों करोड़ भयानक वानर योद्धा कटकटा रहे हैं और करोड़ों ही दौड़ रहे हैं। 'जय राम, प्रबल प्रताप कोसलनाथ श्रीरामचन्द्रजी की जय हो' ऐसा पुकारते हुए वे उनके गुणगण गा रहे हैं।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “राम की सेना समुद्र तट पर” प्रकरण का छन्द १, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीरामजी का वानर सेना सहित समुद्र तट पर शुभ प्रस्थान और पहुँचने का वर्णन है।

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राम की सेना समुद्र तट पर