नख आयुध गिरि पादपधारी
नख आयुध गिरि पादपधारी
चौपाई ५, दोहा ३५ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
नख आयुध गिरि पादपधारी। चले गगन महि इच्छाचारी॥ केहरिनाद भालु कपि करहीं। डगमगाहिं दिग्गज चिक्करहीं॥ ५ ॥
अर्थ
नख ही जिनके शस्त्र हैं, वे इच्छानुसार (सर्वत्र बेरोक-टोक) चलनेवाले रीछ-वानर पर्वतों और वृक्षों की धारण किए कोई आकाशमार्ग से और कोई पृथ्वी पर चले जा रहे हैं। वे सिंह के समान गर्जना कर रहे हैं। [उनके चलने और गर्जने से] दिशाओं के हाथी विचलित होकर चिग्घाड़ रहे हैं।
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “राम की सेना समुद्र तट पर” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीरामजी का वानर सेना सहित समुद्र तट पर शुभ प्रस्थान और पहुँचने का वर्णन है।
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राम की सेना समुद्र तट पर