अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे
चौपाई ३, दोहा ११६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे। मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे॥ देखि कोस मंदिर संपदा। देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा॥ ३ ॥
अर्थ
अब हे प्रभु! इस दास के घर को पवित्र कीजिये और वहाँ चलकर स्नान कीजिये, जिससे युद्ध की थकावट दूर हो जाय। हे कृपालु! खजाना, महल और सम्पत्ति का निरीक्षण कर प्रसन्नतापूर्वक वानरों को दीजिये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण की प्रार्थना और भरतजी की विरह-दशा स्मरण कर राम की अयोध्या लौटने की आतुरता का वर्णन है।
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विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता