तोर कोस गृह मोर सब सत्य
तोर कोस गृह मोर सब सत्य
दोहा ११६ (क) · लंकाकाण्ड
दोहा पाठ
तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात। भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात॥ ११६ (क) ॥
अर्थ
[ श्रीरामजी ने कहा--] हे भाई! सुनो, तुम्हारा खजाना और घर सब मेरा ही है, यह बात सच है। पर भरत की दशा याद करके मुझे एक-एक पल कल्प के समान बीत रहा है।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता” प्रकरण का दोहा ११६ (क) है। इस प्रकरण में विभीषण की प्रार्थना और भरतजी की विरह-दशा स्मरण कर राम की अयोध्या लौटने की आतुरता का वर्णन है।
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विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता