करि बिनती जब संभु सिधाए
करि बिनती जब संभु सिधाए
चौपाई १, दोहा ११६ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
करि बिनती जब संभु सिधाए। तब प्रभु निकट बिभीषनु आए॥ नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी। बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी॥ १ ॥
अर्थ
जब शिवजी विनती करके चले गये, तब विभीषणजी प्रभु के पास आये और चरणों में सिर नवाकर कोमल वाणी से बोले--हे शार्ङ्गधनुष के धारण करनेवाले प्रभो! मेरी विनती सुनिये--।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ११६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में विभीषण की प्रार्थना और भरतजी की विरह-दशा स्मरण कर राम की अयोध्या लौटने की आतुरता का वर्णन है।
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विभीषण की प्रार्थना, राम की अयोध्या-आतुरता