जानत परम दुर्ग अति लंका
जानत परम दुर्ग अति लंका
चौपाई ५, दोहा ३९ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
जानत परम दुर्ग अति लंका। प्रभु प्रताप कपि चले असंका॥ घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी। मुखहिं निसान बजावहिं भेरी॥ ५ ॥
अर्थ
लंका को अत्यन्त श्रेष्ठ (अजेय) किला जानते हुए भी वानर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से निडर होकर चले। चारों ओर से घिरी हुई बादलों की घटा की तरह लंका को चारों दिशाओं से घेरकर वे मुँह से ही डंके और भेरी बजाने लगे।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “अंगद-राम-संवाद” प्रकरण का चौपाई ५, दोहा ३९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में अंगद के लौटने पर राम-मंत्रणा और लंका पर चतुर्दिक आक्रमण की रणनीति का वर्णन है।
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अंगद-राम-संवाद