सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ
दोहा ६३ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
सिव अपमानु न जाइ सहि हृदयँ न होइ प्रबोध। सकल सभहि हठि हटकि तब बोलीं बचन सक्रोध॥ ६३ ॥
अर्थ
परन्तु उनसे शिवजी का अपमान सहा नहीं गया, इससे उनके हृदय में कुछ भी प्रबोध नहीं हुआ। तब वे सारी सभा को हठपूर्वक डाँटकर क्रोधभरे वचन बोलीं--।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का दक्ष यज्ञ में जाना” प्रकरण का दोहा ६३ है। इस प्रकरण में सती का दक्ष के यज्ञ में जाना और शिवजी के अपमान से उनका क्रोधित होना का वर्णन है।
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सती का दक्ष यज्ञ में जाना