तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ

चौपाई ३, दोहा ६३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

तब चित चढ़ेउ जो संकर कहेऊ। प्रभु अपमानु समुझि उर दहेऊ॥ पाछिल दुखु न हृदयँ अस ब्यापा। जस यह भयउ महा परितापा॥ ३ ॥

अर्थ

तब शिवजी ने जो कहा था वह उनकी समझ में आया। स्वामी का अपमान समझकर सती का हृदय जल उठा। पिछला दुःख उनके हृदय में उतना नहीं व्यापा था, जितना महान् दुःख इस समय हुआ।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का दक्ष यज्ञ में जाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ६३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का दक्ष के यज्ञ में जाना और शिवजी के अपमान से उनका क्रोधित होना का वर्णन है।

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सती का दक्ष यज्ञ में जाना