हाहाकार भयउ जग भारी
हाहाकार भयउ जग भारी
चौपाई ४, दोहा ८७ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
हाहाकार भयउ जग भारी। डरपे सुर भए असुर सुखारी॥ समुझि कामसुखु सोचहिं भोगी। भए अकंटक साधक जोगी॥ ४ ॥
अर्थ
जगत् में बड़ा हाहाकार मच गया। देवता डर गये, असुर सुखी हुए। भोगी लोग कामसुख को सोचकर चिन्ता करने लगे और साधक योगी निष्कंटक हो गये।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “रति को वरदान” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रति के विलाप पर शिव द्वारा कामदेव के पुनर्जन्म का वरदान और दिव्य करुणा का वर्णन है।
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रति को वरदान