जोगी अकंटक भए पति गति सुनत

छन्द, दोहा ८७ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

जोगी अकंटक भए पति गति सुनत रति मुरुछित भई। रोदति बदति बहु भाँति करुना करति संकर पहिं गई॥ अति प्रेम करि बिनती बिबिध बिधि जोरि कर सन्मुख रही। प्रभु आसुतोष कृपाल सिव अबला निरखि बोले सही॥

अर्थ

योगी निष्कंटक हो गये, पतिकी यह दशा सुनते ही रति मूर्च्छित हो गयी। रोती-बिलखती और अनेक प्रकार से करुणा करती हुई वह शंकर के पास गयी। अत्यन्त प्रेम से अनेक प्रकार की विनती करके हाथ जोड़कर सामने खड़ी रही। प्रभु आशुतोष कृपालु शिव अबला को देखकर बोले—

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “रति को वरदान” प्रकरण का छन्द, दोहा ८७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में रति के विलाप पर शिव द्वारा कामदेव के पुनर्जन्म का वरदान और दिव्य करुणा का वर्णन है।

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रति को वरदान