राम सप्रेम पुलकि उर लावा

चौपाई १, दोहा १११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

राम सप्रेम पुलकि उर लावा। परम रंक जनु पारसु पावा॥ मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ। मिलत धरें तन कह सबु कोऊ॥ १ ॥

अर्थ

श्रीरामजी ने प्रेमपूर्वक पुलकित होकर उसको हृदय से लगा लिया। [उसे इतना आनन्द हुआ] मानो कोई महादरिद्री मनुष्य पारस पा गया हो। सब कोई [देखनेवाले] कहने लगे कि मानो प्रेम और परमार्थ (परम तत्त्व) दोनों शरीर धारण करके मिल रहे हैं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वन मार्ग में तापस से भेंट” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वन मार्ग में एक तेजस्वी तापस और श्रीराम के मिलन तथा भक्ति-प्रेम के प्रकटन का वर्णन है।

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वन मार्ग में तापस से भेंट