ते पितु मातु कहहु सखि कैसे
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे
चौपाई ४, दोहा १११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे। जिन्ह पठए बन बालक ऐसे॥ राम लखन सिय रूपु निहारी। होहिं सनेह बिकल नर नारी॥ ४ ॥
अर्थ
[इधर गाँव की स्त्रियाँ कह रही हैं—] हे सखी! कहो तो, वे माता-पिता कैसे हैं जिन्होंने ऐसे (सुन्दर, सुकुमार) बालकों को वन में भेज दिया है। श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी के रूप को देखकर सब स्त्री-पुरुष स्नेह से व्याकुल हो जाते हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वन मार्ग में तापस से भेंट” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वन मार्ग में एक तेजस्वी तापस और श्रीराम के मिलन तथा भक्ति-प्रेम के प्रकटन का वर्णन है।
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वन मार्ग में तापस से भेंट