कीन्ह निषाद दंडवत तेही

चौपाई ३, दोहा १११ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कीन्ह निषाद दंडवत तेही। मिलेउ मुदित लखि राम सनेही॥ पिअत नयन पुट रूपु पियूषा। मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा॥ ३ ॥

अर्थ

फिर निषादराज ने उसकी दण्डवत की। श्रीरामचन्द्रजी के प्रेमी को देखकर वह उससे आनन्दित होकर मिला। वह तपस्वी अपने नेत्ररूपी पटलों से रामजी की सौन्दर्य-सुधा का पान करने लगा और ऐसा आनन्दित हुआ जैसे कोई भूखा आदमी स्वादिष्ट भोजन पाकर आनन्दित होता है।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वन मार्ग में तापस से भेंट” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १११ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में वन मार्ग में एक तेजस्वी तापस और श्रीराम के मिलन तथा भक्ति-प्रेम के प्रकटन का वर्णन है।

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वन मार्ग में तापस से भेंट