मंदिर माझ भई नभबानी

चौपाई १, दोहा १०७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड

चौपाई पाठ

मंदिर माझ भई नभबानी। रे हतभाग्य अग्य अभिमानी॥ जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा। अति कृपाल चित सम्यक बोधा॥ १ ॥

अर्थ

मन्दिर में आकाशवाणी हुई कि अरे हतभाग्य! मूर्ख! अभिमानी! यद्यपि तेरे गुरु के क्रोध नहीं है, वे अत्यन्त कृपालु चित्त के हैं और उन्हें [पूर्ण तथा] यथार्थ ज्ञान है।

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।

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गुरु अपमान और शिव का शाप