जे सठ गुर सन इरिषा करहीं
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं
चौपाई ३, दोहा १०७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं। रौरव नरक कोटि जुग परहीं॥ त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा। अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा॥ ३ ॥
अर्थ
जो मूर्ख गुरु से ईर्ष्या करते हैं, वे करोड़ों युगों तक रौरव नरक में पड़े रहते हैं। फिर (वहाँ से निकलकर) वे तिर्यक् योनियों में शरीर धारण करते हैं और दस हजार जन्मों तक दुःख पाते रहते हैं।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।
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गुरु अपमान और शिव का शाप