तदपि साप सठ दैहउँ तोही
तदपि साप सठ दैहउँ तोही
चौपाई २, दोहा १०७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
तदपि साप सठ दैहउँ तोही। नीति बिरोध सोहाइ न मोही॥ जौं नहिं दंड करौं खल तोरा। भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा॥ २ ॥
अर्थ
तो भी हे मूर्ख! तुझको मैं शाप दूँगा; [क्योंकि] नीति का विरोध मुझे अच्छा नहीं लगता। ओरे दुष्ट! यदि मैं तुझे दण्ड न दूँ, तो मेरा वेदमार्ग ही भ्रष्ट हो जाय।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।
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गुरु अपमान और शिव का शाप