करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख

दोहा १०७ (ख) · उत्तरकाण्ड

दोहा पाठ

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि। बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि॥ १०७ (ख) ॥

अर्थ

प्रेम सहित दण्डवत्‌ करके वे ब्राह्मण शिवजी के सामने हाथ जोड़कर मेरी घोर गति का विचार कर गदगद स्वर से विनती करने लगे—

संदर्भ

यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का दोहा १०७ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
गुरु अपमान और शिव का शाप