सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर
दोहा १०६ (ख) · उत्तरकाण्ड
दोहा पाठ
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस। अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस॥ १०६ (ख) ॥
अर्थ
गुरुजी दयालु थे, [मेरा दोष देखकर भी] उन्होंने कुछ नहीं कहा; उनके हृदय में लेशमात्र भी क्रोध नहीं हुआ। पर गुरु का अपमान बहुत बड़ा पाप है; अतः महादेवजी उसे नहीं सह सके।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का दोहा १०६ (ख) है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।
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गुरु अपमान और शिव का शाप