बैठि रहेसि अजगर इव पापी
बैठि रहेसि अजगर इव पापी
चौपाई ४, दोहा १०७ के अंतर्गत · उत्तरकाण्ड
चौपाई पाठ
बैठि रहेसि अजगर इव पापी। सर्प होहि खल मल मति ब्यापी॥ महा बिटप कोटर महुँ जाई। रहु अधमाधम अधगति पाई॥ ४ ॥
अर्थ
अरे पापी! तू गुरु के सामने अजगर की भाँति बैठा रहा। रे दुष्ट! तेरी बुद्धि पाप से ढक गयी है, [अतः] तू सर्प हो जा। और अरे अधम से भी अधम! इस अधोगति (सर्प की नीची योनि) को पाकर किसी बड़े भारी पेड़ के खोखले में जाकर रह।
संदर्भ
यह उत्तरकाण्ड के “गुरु अपमान और शिव का शाप” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में काकभुशुण्डि द्वारा पूर्वजन्म में गुरु-अपमान और शिवजी के शाप का वृत्तांत का वर्णन है।
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गुरु अपमान और शिव का शाप