नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू
चौपाई १, दोहा २५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू। गरुअ कठोर बिदित सब काहू॥ रावनु बानु महाभट भारे। देखि सरासन गवँहिं सिधारे॥ १ ॥
अर्थ
राजाओं के भुजाओं का बल चन्द्रमा है, शिवजी का धनुष राहु है। वह भारी है, कठोर है, यह सबको विदित है। बड़े भारी योद्धा रावण और बाणासुर भी इस धनुष को देखकर भाग खड़े हुए (उसे उठाना तो दूर रहा, छूने तक की हिम्मत न हुई)।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में बंदीजनों द्वारा सभा में जनक की शिवधनुष-प्रतिज्ञा का उद्घोष और राजाओं का उत्साह का वर्णन है।
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बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा