तब बंदीजन जनक बोलाए
तब बंदीजन जनक बोलाए
चौपाई ४, दोहा २४९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तब बंदीजन जनक बोलाए। बिरिदावली कहत चलि आए॥ कह नृपु जाइ कहहु पन मोरा। चले भाट हियँ हरषु न थोरा॥ ४ ॥
अर्थ
तब राजा जनक ने बंदीजनों (भाटों) को बुलाया। वे विरुदावली (वंश की कीर्ति) गाते हुए चले आये। राजा ने कहा--जाकर मेरा प्रण सबसे कहो। भाट चले, उनके हृदय में कम आनन्द न था।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में बंदीजनों द्वारा सभा में जनक की शिवधनुष-प्रतिज्ञा का उद्घोष और राजाओं का उत्साह का वर्णन है।
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बंदीजनों द्वारा जनकप्रतिज्ञा की घोषणा