अस कहि जोग अगिनि तनु जारा
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा
चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत · अरण्यकाण्ड
चौपाई पाठ
अस कहि जोग अगिनि तनु जारा। राम कृपाँ बैकुंठ सिधारा॥ ताते मुनि हरि लीन न भयऊ। प्रथमहिं भेद भगति बर लयऊ॥ १ ॥
अर्थ
ऐसा कहकर शरभंगजी ने योगाग्नि से अपने शरीर को जला डाला और श्रीरामजी की कृपा से वे वैकुण्ठ को चले गये। मुनि भगवान् में लीन इसलिये नहीं हुए कि उन्होंने पहले ही भेद-भक्ति का वर ले लिया था।
संदर्भ
यह अरण्यकाण्ड के “राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम द्वारा मुनियों की अस्थियाँ देख राक्षस वध की प्रतिज्ञा करने का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राक्षस वध की प्रतिज्ञा करना