कहेहु तात अस मोर प्रनामा

चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब प्रकार प्रभु पूरनकामा॥ दीन दयाल बिरिदु संभारी। हरहु नाथ मम संकट भारी॥ २ ॥

अर्थ

[जानकीजी ने कहा--] हे तात! मेरा प्रणाम निवेदन करना और इस प्रकार कहना-हे प्रभु! यद्यपि आप सब प्रकार से पूर्णकाम हैं (आपको किसी प्रकार की कामना नहीं है), तथापि दीनों (दुखियों) पर दया करना आपका विरद है [और मैं दीन हूँ], अतः उस विरद को याद करके, हे नाथ! मेरे भारी संकट को दूर कीजिये।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका दहन के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा लेना और चूड़ामणि प्राप्त करना का वर्णन है।

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सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति