कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना
चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
चौपाई पाठ
कहु कपि केहि बिधि राखौं प्राना। तुम्हहू तात कहत अब जाना॥ तोहि देखि सीतलि भइ छाती। पुनि मो कहुँ सोइ दिनु सो राती॥ ४ ॥
अर्थ
हे हनुमान्! कहो, मैं किस प्रकार प्राण रखूँ! हे तात! तुम भी अब जाने को कह रहे हो। तुम्हें देखकर छाती ठंडी हुई थी। फिर मुझे वही दिन और वही रात!
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका दहन के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा लेना और चूड़ामणि प्राप्त करना का वर्णन है।
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सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति