तात सक्रसुत कथा सुनाएहु

चौपाई ३, दोहा २७ के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड

चौपाई पाठ

तात सक्रसुत कथा सुनाएहु। बान प्रताप प्रभुहि समुझाएहु॥ मास दिवस महुँ नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥ ३ ॥

अर्थ

हे तात! इन्द्रपुत्र जयन्त की कथा (घटना) सुनाना और प्रभु को उनके बाण का प्रताप समझाना [स्मरण कराना]। यदि एक मास में नाथ न आये, तो फिर मुझे जीवित न पायेंगे।

संदर्भ

यह सुन्दरकाण्ड के “सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा २७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में लंका दहन के बाद हनुमानजी का सीताजी से विदा लेना और चूड़ामणि प्राप्त करना का वर्णन है।

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सीताजी से विदा और चूड़ामणि प्राप्ति