शंखेन्द्वाभमतीव सुन्दरतनुं
शंखेन्द्वाभमतीव सुन्दरतनुं
श्लोक २ · लंकाकाण्ड
श्लोक पाठ
शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम्। काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शंकरम्॥ २ ॥
अर्थ
शंख और चन्द्रमा-सी कान्ति वाले अत्यन्त सुन्दर शरीर वाले, व्याघ्रचर्म के वस्त्र वाले, काल के समान [अथवा काले रंग के] भयानक सर्पों के भूषण धारण करने वाले, गंगा और चन्द्रमा के प्रिय, काशीपति, कलियुग के पाप-समूह का नाश करने वाले, कल्याण के कल्पद्रुम, गुणों के निधान और कामदेव को भस्म करने वाले पार्वतीपति वन्दनीय श्रीशंकरजी को मैं नमस्कार करता हूँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक २ है। इस प्रकरण में लंकाकाण्ड के आरंभ में तुलसीदास द्वारा श्रीराम, शिव और गुरु की भक्तिमय वंदना का वर्णन है।
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मंगलाचरण