रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं
श्लोक १ · लंकाकाण्ड
श्लोक पाठ
रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम्। मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम्॥ १ ॥
अर्थ
कामदेव के शत्रु शिवजी के सेव्य, भव (जन्म-मृत्यु) के भय को हरनेवाले, कालरूपी मतवाले हाथी के लिये सिंह के समान, योगियों के स्वामी (योगीश्वर), ज्ञान के द्वारा जानने योग्य, गुणों की निधि, अजेय, निर्गुण, निर्विकार, माया से परे, देवताओं के स्वामी, दुष्टों के वध में तत्पर, ब्राह्मणवृन्द के एकमात्र देवता (रक्षक), जलवाले मेघ के समान सुन्दर श्याम, कमल के-से नेत्रवाले, पृथ्वीपति (राजा) के रूप में परमदेव श्रीरामजी की मैं वन्दना करता हूँ।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक १ है। इस प्रकरण में लंकाकाण्ड के आरंभ में तुलसीदास द्वारा श्रीराम, शिव और गुरु की भक्तिमय वंदना का वर्णन है।