कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ

श्लोक १ · किष्किन्धाकाण्ड

श्लोक पाठ

कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ। मायामानुषरूपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः॥ १ ॥

अर्थ

कुन्दपुष्प और नील कमलके समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान, विज्ञानके धाम, शोभासम्पन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदोंके द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मणोंके समूहके प्रिय [अथवा प्रेमी], मायासे मनुष्यरूप धारण किये हुए, श्रेष्ठ धर्मके लिये कवचस्वरूप, सबके हितकारी, श्रीसीताजीकी खोजमें लगे हुए, पथिकरूप रघुकुलके श्रेष्ठ श्रीरामजी और श्रीलक्ष्मणजी दोनों भाई निश्चय ही हमें भक्तिप्रद हों।

संदर्भ

यह किष्किन्धाकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक १ है। इस प्रकरण में किष्किंधाकांड के आरंभ में श्रीराम-नाम, शंकर और काशी की भक्तिमय वंदना का वर्णन है।

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मंगलाचरण