जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल
सोरठा २ · किष्किन्धाकाण्ड
सोरठा पाठ
जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय। तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस॥ २ ॥
अर्थ
जिस भीषण हलाहल विष से सब देवतागण जल रहे थे, उसको जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, हे मन्द मन! तू उन शंकरजी को क्यों नहीं भजता? उनके समान कृपालु कौन है?।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का सोरठा २ है। इस प्रकरण में किष्किंधाकांड के आरंभ में श्रीराम-नाम, शंकर और काशी की भक्तिमय वंदना का वर्णन है।
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मंगलाचरण