ब्रह्माम्भोधि समुद्भवं कलिमल प्रध्वंसनं
ब्रह्माम्भोधि समुद्भवं कलिमल प्रध्वंसनं
श्लोक २ · किष्किन्धाकाण्ड
श्लोक पाठ
ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा। संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं धन्यास्ते कृतिनः पिबन्ति सततं श्रीरामनामामृतम्॥ २ ॥
अर्थ
वे सुकृती (पुण्यात्मा पुरुष) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [के मंथन] से उत्पन्न हुए कलियुग के मल को सर्वथा नष्ट कर देनेवाले, अविनाशी, भगवान् श्रीशम्भु के सुन्दर एवं श्रेष्ठ मुखरूपी चन्द्रमा में सदा शोभायमान, जन्म-मरणरूपी रोग के औषध, सबको सुख देनेवाले और श्रीजानकीजी के जीवनस्वरूप श्रीरामनामरूपी अमृत का निरन्तर पान करते रहते हैं।
संदर्भ
यह किष्किन्धाकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक २ है। इस प्रकरण में किष्किंधाकांड के आरंभ में श्रीराम-नाम, शंकर और काशी की भक्तिमय वंदना का वर्णन है।
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मंगलाचरण