यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता
श्लोक १ · अयोध्याकाण्ड
श्लोक पाठ
यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट्। सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम्॥ १ ॥
अर्थ
जिनकी गोद में हिमाचलसुता पार्वतीजी, मस्तक पर गङ्गाजी, ललाट पर बालचन्द्रमा, कण्ठ में हलाहल विष और वक्षःस्थल पर सर्पराज शेषजी सुशोभित हैं, वे भस्म से विभूषित, देवताओं में श्रेष्ठ, सर्वेश्वर, संहारकर्ता [या भक्तों के पापों के नाशक], सर्वव्यापक, कल्याणरूप, चन्द्रमा के समान शुभ्रवर्ण श्रीशङ्करजी सदा मेरी रक्षा करें।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक १ है। इस प्रकरण में अयोध्याकांड के आरंभ में शिव, गुरु और संतों की श्रद्धापूर्ण वंदना का वर्णन है।
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मंगलाचरण