मूलं धर्मतरोर् विवेकजलधेः

श्लोक १ · अरण्यकाण्ड

श्लोक पाठ

मूलं धर्मतरोर्विवेकजलधेः पूर्णेन्दुमानन्ददं वैराग्याम्बुजभास्करं ह्यघघनध्वान्तापहं तापहम्‌। मोहाम्भोधरपूगपाटनविधौ स्वःसम्भवं शङ्करं वन्दे ब्रह्मकुलं कलङ्कशमनं श्रीरामभूपप्रियम्‌॥ १ ॥

अर्थ

धर्मरूपी वृक्ष के मूल, विवेकरूपी समुद्र को आनन्द देनेवाले पूर्णचन्द्र, वैराग्यरूपी कमल के सूर्य, पापरूपी घोर अन्धकार को निश्चय ही मिटानेवाले, तीनों तापों को हरनेवाले, मोहरूपी बादलों के समूह को छिन्न-भिन्न करने की विधि में आकाश से उत्पन्न पवनस्वरूप, ब्रह्मकुल के कलंक को शान्त करनेवाले, श्रीरामभूप के प्रिय श्रीशङ्करजी की मैं वन्दना करता हूँ।

संदर्भ

यह अरण्यकाण्ड के “मंगलाचरण” प्रकरण का श्लोक १ है। इस प्रकरण में अरण्यकाण्ड के आरंभ में शिव, श्रीराम, सीता और गुरु चरणों की वंदना का वर्णन है।

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मंगलाचरण