निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह
छन्द, दोहा ६० के अंतर्गत · सुन्दरकाण्ड
छन्द पाठ
निज भवन गवनेउ सिंधु श्रीरघुपतिहि यह मत भायऊ। यह चरित कलि मलहर जथामति दास तुलसी गायऊ॥ सुख भवन संसय समन दवन बिषाद रघुपति गुन गना। तजि सकल आस भरोस गावहि सुनहि संतत सठ मना॥
अर्थ
समुद्र अपने भवन चला गया, श्रीरघुपतिजी को यह मत भाया। यह चरित कलि-मलहर है; इसे दास तुलसी ने अपनी मति के अनुसार गाया। सुख के भवन, सन्देह के नाशक, विषाद के दमनकर्ता श्रीरघुपति के गुणगान को गाओ। सब आशा-भरोसा त्यागकर, हे सठ मन! निरन्तर गाओ और सुनो॥
संदर्भ
यह सुन्दरकाण्ड के “श्रीराम गुणगान की महिमा” प्रकरण का छन्द, दोहा ६० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के गुणगान और भक्ति की अपार महिमा तथा मंगलकारी फल का वर्णन है।
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श्रीराम गुणगान की महिमा