एहि बिधि सोचत भरत मन धावन
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन
दोहा १५७ · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ॥ १५७ ॥
अर्थ
भरतजी इस प्रकार मन में चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरु के अनुशासन को सुनकर वे गणेशजी को मनाकर चल पड़े।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वशिष्ठ का भरत को बुलाने हेतु दूत भेजना” प्रकरण का दोहा १५७ है। इस प्रकरण में दशरथ के देहावसान के बाद वशिष्ठ द्वारा भरत और शत्रुघ्न को अयोध्या बुलाने हेतु दूत-प्रेषण का वर्णन है।
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वशिष्ठ का भरत को बुलाने हेतु दूत भेजना